आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मिक प्रगति के लिए अवलम्बन की आवश्यकता आत्मिक प्रगति के लिए अवलम्बन की आवश्यकताश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मिक प्रगति के लिए अवलम्बन की आवश्यकता
अध्यात्म क्षेत्र में भी वही बात इसी तरह लागू होती हैं। आत्मिक क्षेत्र
की प्रगति भौतिक प्रगति से कम नहीं, अधिक ही अभीष्ट है। आत्मिक प्रगति से
ही व्यक्ति को अनगढ़ से सुगढ़ बनने एवं अपने व्यक्तित्व की गरिमा को
असाधारण रूप से बढ़ाने का अवसर मिलता है। उसकी जो फलश्रुतियाँ हैं,
अपरिमित उपलब्धियाँ हैं उन्हें देखते हुए गुरु का आश्रय लेना हर दृष्टि से
अनिवार्य माना जाना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तरह तीन देवता धरती के
माने गये हैं। माता, पिता और गुरु की तुलना उन त्रिदेवों से की गयी है।
माता ब्रह्मा क्योंकि वह बालक को पेट में रखती और अपना शरीर काट कर, बालक
का शरीर बनाकर जन्म देती है। पिता को विष्णु माना गया है, क्योंकि वह बालक
के भरण-पोषण की, शिक्षा, करके उसे समर्थ बनाता है। इस प्रकार पिता विष्णु
ठहरता है। गुरु की गरिमा इन दोनों से ऊँची है। माता-पिता तो मात्र शरीर का
ही सृजन, और पोषण करते हैं जबकि गुरु आत्मा में व्यक्तित्व में
सुसंस्करिता का आरोपण करके, उसे इसी जन्म में दूसरा जन्म प्रदान करता है।
द्विजत्व एक उच्चस्तरीय संस्कार है, जिसे यज्ञोपवीत दीक्षा के साथ
कर्मकाण्ड के रूप में सम्पन्न किया जाता है। यह प्रतीक पूजा हुई। वस्तुत:
इस कृत्य के पीछे गुरु वरण की भूमिका ही काम करती है। माता पिता के सहयोग
से मानव शरीर की उपलब्धि जितनी महत्वपूर्ण है, उससे भी अधिक गुरु महिमा की
सहायता नर-पशु का, नर-नारायण बनने की संभावना के सम्बन्ध में समझी जा सकती
है। आत्मिक क्षेत्र का परिशोधन परिष्कार कर सकने वाली गुरु गरिमा को
वस्तुत: मूर्तिमान शिव कहा जा सकता है। इसी रूप में वंदना अभ्यर्थना के
स्तवन छद भी बने और गाये गये हैं।
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- आत्मिक प्रगति के लिए अवलम्बन की आवश्यकता
- श्रद्धा का आरोपण - गुरू तत्त्व का वरण
- समर्थ बनना हो, तो समर्थों का आश्रय लें
- इष्टदेव का निर्धारण
- दीक्षा की प्रक्रिया और व्यवस्था
- देने की क्षमता और लेने की पात्रता
- तथ्य समझने के उपरान्त ही गुरुदीक्षा की बात सोचें
- गायत्री उपासना का संक्षिप्त विधान